श्री कागभुशुण्डिगुरु (लोमश ऋषि) कृतं रुद्राष्टकम्
श्री शिव रुद्राष्टकम पाठ का महत्व
शास्त्रों में शिव रुद्राष्टकम पाठ का महत्व बताया गया है. शिव रुद्राष्टकम भगवान शिव के रूप व शक्तियों पर आधारित हैं. भगवान श्रीराम ने भी रावण जैसे शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए शिव रूद्राष्टकम स्तुति का पाठ किया था. परिणाम स्वरूप श्रीराम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की. शिव रुद्राष्टकम पाठ के जाप से काकभुशुण्डि जी शाप मुक्त हुए थे रामायण के उत्तरकांड में इसका व्याख्यान हे | . शिव रुद्राष्टकम पाठ के जाप से बड़े से बड़े शत्रु पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है| भगवन आसुतोष शिव सभी मनोकामनाए पूरी करते है |
अर्थ, महत्व और पाठ से मिलने वाले फल
🔱 रुद्राष्टकम् का परिचय
रुद्राष्टकम् भगवान शिव की अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है, जिसकी रचना श्री कागभुशुण्डिगुरु (लोमश ऋषि) ने की थी। यह स्तोत्र आठ श्लोकों में भगवान शिव के निर्गुण, निराकार, करुणामय और सर्वशक्तिमान स्वरूप का वर्णन करता है।
शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीराम ने भी रावण जैसे महाबली शत्रु पर विजय प्राप्त करने हेतु शिव रुद्राष्टकम् का पाठ किया था। इसके प्रभाव से उन्हें लंका विजय प्राप्त हुई।
रामायण के उत्तरकांड में वर्णन आता है कि कागभुशुण्डि जी भी इस स्तोत्र के पाठ से शापमुक्त हुए थे।
🕉️ श्री शिव रुद्राष्टकम् पाठ का महत्व
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रुद्राष्टकम् भगवान शिव की शक्ति, करुणा और महिमा को प्रकट करता है।
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इसका नियमित पाठ शत्रुओं पर विजय, मानसिक शांति, रोग-निवारण और मनोकामना पूर्ति में सहायक माना गया है।
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भगवान शिव को आशुतोष कहा जाता है, वे शीघ्र प्रसन्न होकर भक्तों की प्रार्थना स्वीकार करते हैं।
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यह स्तोत्र भय, दुख, क्लेश और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है।
श्री शिव रुद्राष्टकम्
(श्लोक सहित सरल अर्थ)
🔱 श्लोक 1
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं,
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं,
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥अर्थ:
मैं उन भगवान शिव को नमन करता हूँ जो मोक्ष स्वरूप हैं, सर्वव्यापी ब्रह्म हैं और वेदों में वर्णित हैं। वे निर्गुण, निष्काम और विचारों से परे हैं तथा चेतन आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त हैं।🔱 श्लोक 2
निराकारमोंकार मूलं तुरीयं,
गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालुं,
गुणागार संसार पारं नतोऽहम् ॥अर्थ:
जो निराकार हैं, ॐकार के मूल और चौथी अवस्था (तुरीय) के अधिपति हैं। जो ज्ञान से परे, पर्वतराज हिमालय के स्वामी, महाकाल होते हुए भी अत्यंत कृपालु हैं—मैं उन्हें नमन करता हूँ।🔱 श्लोक 3
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं,
मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा,
लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा ॥अर्थ:
जो हिमालय के समान गौरवर्ण और गंभीर हैं, जिनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है। जिनके मस्तक पर गंगा और ललाट पर चंद्रमा शोभित है तथा कंठ में सर्प विराजमान है।🔱 श्लोक 4
चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं,
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं,
प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥अर्थ:
जिनके कुंडल हिलते रहते हैं, नेत्र विशाल हैं, मुख प्रसन्न है और कंठ नील है। जो दयालु हैं, मृगचर्म धारण करते हैं और समस्त लोकों के स्वामी हैं—मैं उन शंकर की भक्ति करता हूँ।🔱 श्लोक 5
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं,
अखण्डं अजं भानुकोटि प्रकाशम् ।
त्रिशूल निर्मूलनं शूलपाणिं,
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥अर्थ:
जो अत्यंत शक्तिशाली, श्रेष्ठ और परमेश्वर हैं। जो अजन्मा हैं और जिनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है। जो त्रिशूलधारी और भवानी के पति हैं, मैं उन्हें भक्ति भाव से भजता हूँ।🔱 श्लोक 6
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी,
सदा सच्चिदानन्द दाता पुरारी ।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी,
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥अर्थ:
जो कलाओं से परे हैं, कल्याण करने वाले और सृष्टि के अंतकर्ता हैं। जो सदा आनंद देने वाले, मोह का नाश करने वाले और कामदेव के संहारक हैं—हे प्रभु! मुझ पर कृपा करें।🔱 श्लोक 7
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं,
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावद् सुखं शान्ति सन्तापनाशं,
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥अर्थ:
जब तक मनुष्य इस लोक या परलोक में उमा पति शिव के चरण कमलों की भक्ति नहीं करता, तब तक उसे सच्चा सुख और शांति नहीं मिलती।🔱 श्लोक 8
न जानामि योगं जपं नैव पूजां,
नतोऽहम् सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं,
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥अर्थ:
मैं न योग जानता हूँ, न जप और न ही पूजा। हे शंभु! मैं सदा आपको नमन करता हूँ। जन्म और बुढ़ापे के दुखों से पीड़ित मेरी रक्षा करें।🔔 फलश्रुति
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥
अर्थ:
यह रुद्राष्टकम ऋषि द्वारा आनंद के लिए कहा गया है। जो व्यक्ति इसे श्रद्धा और भक्ति से पढ़ते हैं, उन पर भगवान शिव अवश्य प्रसन्न होते हैं।
🔱 रुद्राष्टकम् : प्रश्न–उत्तर (FAQ)
❓ प्रश्न 1: रुद्राष्टकम् क्या है?
उत्तर:
रुद्राष्टकम् भगवान शिव की एक प्रसिद्ध स्तुति है, जिसमें आठ श्लोकों के माध्यम से उनके निराकार, निर्गुण और करुणामय स्वरूप का वर्णन किया गया है।
❓ प्रश्न 2: रुद्राष्टकम् की रचना किसने की थी?
उत्तर:
रुद्राष्टकम् की रचना श्री कागभुशुण्डिगुरु, जिन्हें लोमश ऋषि भी कहा जाता है, ने की थी।
❓ प्रश्न 3: रुद्राष्टकम् का पाठ क्यों किया जाता है?
उत्तर:
रुद्राष्टकम् का पाठ शांति, मानसिक संतुलन, शत्रु बाधा से मुक्ति और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
❓ प्रश्न 4: रुद्राष्टकम् का उल्लेख किस ग्रंथ में मिलता है?
उत्तर:
रुद्राष्टकम् का उल्लेख रामायण के उत्तरकांड में मिलता है, जहाँ इसके महत्व का वर्णन किया गया है।
❓ प्रश्न 5: भगवान श्रीराम ने रुद्राष्टकम् का पाठ क्यों किया था?
उत्तर:
भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए रुद्राष्टकम् का पाठ किया था, जिससे उन्हें सफलता मिली।
❓ प्रश्न 6: रुद्राष्टकम् पाठ से कौन-कौन से लाभ मिलते हैं?
उत्तर:
रुद्राष्टकम् के पाठ से शत्रु पर विजय, भय और कष्टों से मुक्ति, रोग निवारण, मनोकामना पूर्ति और आत्मिक शांति मिलती है।
❓ प्रश्न 7: रुद्राष्टकम् का पाठ कब करना श्रेष्ठ माना गया है?
उत्तर:
रुद्राष्टकम् का पाठ सोमवार, महाशिवरात्रि, श्रावण मास और प्रतिदिन प्रातः या संध्या काल में करना उत्तम माना गया है।
❓ प्रश्न 8: क्या रुद्राष्टकम् का पाठ गृहस्थ व्यक्ति कर सकता है?
उत्तर:
हाँ, रुद्राष्टकम् का पाठ गृहस्थ, विद्यार्थी, वृद्ध सभी कर सकते हैं। इसके लिए कोई विशेष दीक्षा आवश्यक नहीं है।
❓ प्रश्न 9: रुद्राष्टकम् में भगवान शिव को कैसे वर्णित किया गया है?
उत्तर:
रुद्राष्टकम् में भगवान शिव को निराकार, महाकाल, गंगाधर, नीलकंठ, करुणामय और सर्वशक्तिमान बताया गया है।
❓ प्रश्न 10: रुद्राष्टकम् की फलश्रुति क्या कहती है?
उत्तर:
फलश्रुति के अनुसार, जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से रुद्राष्टकम् का पाठ करते हैं, उन पर भगवान शिव अवश्य प्रसन्न होते हैं।
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