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ओले गिरे खेतों पर… टूट गया किसान का भविष्य

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( रघुवीर सिंह पंवार ) ओलावृष्टि , फसल बर्बादी और सिस्टम की संवेदनहीनता  खेत में खड़ा किसान जब आसमान की ओर देखता है , तो वह सिर्फ बादलों को नहीं देखता — वह अपने बच्चों की पढ़ाई , घर की रसोई , बूढ़े माँ-बाप की दवा और आने वाले कल का भरोसा देखता है। लेकिन जब उसी आसमान से ओले बरसते हैं , तो वे सिर्फ मिट्टी पर नहीं गिरते , वे किसान के सपनों को कुचलते हुए गिरते हैं। मध्य प्रदेश   के ग्रामीण अंचलों में हाल ही में हुई ओलावृष्टि ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि किसान की ज़िंदगी आज भी मौसम की दया पर टिकी हुई है। महीनों की मेहनत , रातों की जाग , पसीने की हर बूँद — सब कुछ कुछ ही मिनटों में सफ़ेद ओलों के नीचे दबकर रह गया। यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह एक सामाजिक त्रासदी , एक मानवीय संकट और एक नीतिगत असफलता की कहानी है। जब खेत श्मशान बन जाए ओलावृष्टि के बाद का दृश्य किसी युद्धभूमि से कम नहीं था। हरी-भरी फसलें ज़मीन पर बिछ चुकी थीं। बालियाँ टूटकर मिट्टी में दबी थीं। खेतों में खड़ा पानी और उस पर तैरते पत्ते इस बात के गवाह थे कि प्रकृति ने बेरहमी दिखाई है। लेकिन इ...