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चमचागिरी का चमचमाता संसार ( व्यंग्य)

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 सत्ता, व्यवस्था और समाज में फैलती चापलूसी की संस्कृति                              किसी भी समाज , संस्था या लोकतंत्र की वास्तविक सेहत इस बात से पहचानी जाती है कि वहाँ असहमति और सच के लिए कितनी जगह बची है। दुर्भाग्य से हमारे समय की सबसे तेज़ी से फलती‑फूलती प्रवृत्तियों में एक है — चमचागिरी। यह अब केवल व्यक्तिगत व्यवहार या अवसरवादी आदत नहीं रही , बल्कि एक सुव्यवस्थित संस्कृति बन चुकी है , जो सत्ता , प्रशासन , कार्यालयों , मीडिया और सामाजिक जीवन के हर कोने में अपनी चमक बिखेर रही है। बाहर से यह संसार जितना चमकदार दिखता है , भीतर से उतना ही खोखला और भयग्रस्त है। चमचागिरी का मूल सिद्धांत बड़ा सरल है — सच वही है , जो ताकतवर को अच्छा लगे। तथ्य , तर्क और विवेक यहाँ बाधा माने जाते हैं। शब्दों को इस तरह सजाया जाता है कि वे वास्तविकता नहीं , बल्कि इच्छित छवि गढ़ें। यही कारण है कि गलत निर्णय भी दूरदर्शिता कहलाते हैं , विफलताएँ रणनीति बन जाती हैं और चुप्पी को समझदारी का नाम दे दिया जाता है। प्रशंसा और चापलूसी के बीच...