लघुकथा : वह ढाल सच्ची घटना
माँ का दूसरा नाम – कंचन बाई कंचन बाई अनगंवाडी कार्यकर्त्ता आंगनवाड़ी में उस दिन भी हँसी का शोर था। कंचन बाई ने बच्चों को पंक्ति में बिठाया— बीस नन्हे जीवन, बीस उम्मीदें। अचानक हवा काँप गई। पेड़ से मधुमक्खियाँ नहीं, मौत टूटकर उतरी। चारों ओर भगदड़ मच गई। लेकिन कंचन बाई नहीं भागीं। उन्होंने बच्चों को देखा— डरे हुए, सहमे हुए, माँ की ओर देखती आँखें। कंचन बाई ने अपनी साड़ी खोली, पास पड़ी तिरपाल उठाई, और बच्चों को अपने भीतर समेट लिया। खुद सामने खड़ी हो गईं— निहत्थी… लेकिन अडिग। डंक पड़ते रहे। एक… दस… सैकड़ों… हज़ारों। शरीर नीला पड़ता गया, साँसें लड़खड़ाती रहीं, लेकिन बाहें नहीं हिलीं। कंचन बाई बस एक ही बात दोहराती रहीं— “डरो मत… मैं हूँ।” जब आख़िरी बच्चा सुरक्षित बाहर पहुँचा, तब वह ढाल ज़मीन पर गिर पड़ी। कंचन बाई चली गईं… पर उस दिन बीस बच्चे ज़िंदा रह गए। आज घोषणाएँ हैं, मुआवज़ा है, सहायता है। पर सच यह है— कंचन बाई ने अपने प्राण देकर माँ शब्द को फिर से परिभाषित कर दिया। कुछ लोग इतिहास में नाम नहीं छोड़ते, वे दिलों में घर बना लेते हैं। नीमच: मध...