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होली: आस्था, अध्यात्म और सामाजिक समरसता का विराट उत्सव

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 भारत पर्वों का देश है, और इन पर्वों में यदि कोई उत्सव जीवन के सबसे अधिक रंगों को अपने भीतर समेटे हुए है, तो वह होली है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम, सामाजिक एकता और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। होली भारतीय संस्कृति के उस जीवंत स्वरूप को सामने लाती है, जिसमें धर्म और लोकजीवन एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। होली का उल्लास खेत-खलिहानों से लेकर महानगरों तक, मंदिरों से लेकर चौपालों तक और बच्चों की किलकारियों से लेकर बुजुर्गों की मुस्कान तक समान रूप से दिखाई देता है। यह त्योहार हमें जीवन के रंगों को समझने और उन्हें स्वीकार करने की सीख देता है। धार्मिक आधार: आस्था की अमर गाथा होली की पौराणिक कथा का केंद्र है प्रह्लाद की अडिग भक्ति। कथा के अनुसार, असुरराज हिरण्यकश्यप ने कठोर तप कर वरदान प्राप्त किया और स्वयं को ईश्वर समझने लगा। उसने अपने राज्य में भगवान का नाम लेने पर प्रतिबंध लगा दिया। किंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के अनेक अत्याचारों के बावजूद प्रह्लाद की श्रद्धा डगमगाई नहीं।...