करुणा, त्याग और गुरु-शिष्य परंपरा की अनुपम कथा: स्वामी विवेकानंद और माँ सारदा देवी
यह घटना उस दौर की है जब स्वामी विवेकानंद , जिन्हें बचपन में नरेंद्र कहा जाता था, अपने जीवन के एक निर्णायक मोड़ पर खड़े थे। उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का देहांत हो चुका था। गुरु के जाने के बाद उनके भीतर एक ही संकल्प जन्म ले चुका था— स्वामी विवेकानंद भारत की आध्यात्मिक धरोहर, वेदांत और सनातन ज्ञान को पूरे विश्व तक पहुँचाना। उनका मन विशेष रूप से अमेरिका जाकर विश्व धर्म संसद 1893 में भाग लेने के लिए व्याकुल था। लेकिन वे केवल एक संन्यासी नहीं थे—वे एक आदर्श शिष्य भी थे। 🙏 गुरु-माता की अनुमति — सबसे पहले स्वामी विवेकानंद जानते थे कि कोई भी बड़ा कदम बिना आशीर्वाद के अधूरा है। इसलिए वे पहुँचे अपनी गुरु-माता, माँ सारदा देवी के पास। उन्होंने विनम्रता से अपनी इच्छा व्यक्त की— “माँ, मैं विदेश जाना चाहता हूँ… भारत का संदेश दुनिया तक पहुँचाना चाहता हूँ।” माँ सारदा देवी के मन में दुविधा थी। एक तरफ शिष्य का उज्ज्वल भविष्य था, दूसरी ओर समुद्र पार की कठिन और अनजान दुनिया। वे यह भी देखना चाहती थीं कि क्या नरेंद्र के भीतर अभी भी वही निःस्वार्थता, करुणा और सेवा भाव जीवित है, जो एक सच्च...