चमचागिरी का चमचमाता संसार ( व्यंग्य)
सत्ता, व्यवस्था और समाज में फैलती चापलूसी की संस्कृति
किसी भी समाज, संस्था या लोकतंत्र की वास्तविक सेहत इस बात से पहचानी जाती है कि वहाँ असहमति और सच के लिए कितनी जगह बची है। दुर्भाग्य से हमारे समय की सबसे तेज़ी से फलती‑फूलती प्रवृत्तियों में एक है—चमचागिरी। यह अब केवल व्यक्तिगत व्यवहार या अवसरवादी आदत नहीं रही, बल्कि एक सुव्यवस्थित संस्कृति बन चुकी है, जो सत्ता, प्रशासन, कार्यालयों, मीडिया और सामाजिक जीवन के हर कोने में अपनी चमक बिखेर रही है। बाहर से यह संसार जितना चमकदार दिखता है, भीतर से उतना ही खोखला और भयग्रस्त है।
चमचागिरी का मूल सिद्धांत बड़ा सरल है—सच
वही है, जो ताकतवर को अच्छा लगे। तथ्य,
तर्क और विवेक यहाँ बाधा माने जाते हैं।
शब्दों को इस तरह सजाया जाता है कि वे वास्तविकता नहीं, बल्कि
इच्छित छवि गढ़ें। यही कारण है कि गलत निर्णय भी दूरदर्शिता कहलाते हैं, विफलताएँ
रणनीति बन जाती हैं और चुप्पी को समझदारी का नाम दे दिया जाता है।
प्रशंसा
और चापलूसी के बीच मिटती सीमा
प्रशंसा सच्चाई से उपजती है, जबकि
चापलूसी सुविधा से। लेकिन आज इन दोनों के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। हर निर्णय
पर ताली बजाने की प्रवृत्ति ने आत्ममंथन की प्रक्रिया को रोक दिया है। जब हर बात
सही ठहराई जाने लगे, तब सुधार की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है। यह स्थिति किसी भी
व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक होती है,
क्योंकि गलतियाँ दिखाई देना बंद हो जाती
हैं और उनका बोझ अंततः समाज को उठाना पड़ता है।
सत्ता
और चमचागिरी की खतरनाक निकटता
सत्ता स्वभाव से ही आलोचना से असहज होती
है। यही असहजता चमचागिरी को बढ़ावा देती है। सत्ता के इर्द‑गिर्द धीरे‑धीरे ऐसे
लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है, जो सवाल नहीं करते, बल्कि
हर निर्णय पर सहमति की मुहर लगा देते हैं। सच बोलने वाले या तो बाहर कर दिए जाते
हैं या हाशिये पर डाल दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप निर्णय सीमित दृष्टि से लिए जाते
हैं और सत्ता अपने ही गढ़े भ्रम में जीने लगती है। इतिहास गवाह है कि जब भी सत्ता
ने केवल प्रशंसा सुनी, उसका पतन अवश्यंभावी हुआ।
कार्यालयी
संस्कृति में चापलूसी का संस्थानीकरण
दफ्तरों में चमचागिरी अब व्यक्तिगत
कमजोरी नहीं, बल्कि कई जगह अनकही योग्यता बन चुकी है। मेहनत, दक्षता
और ईमानदारी की जगह यह देखा जाने लगा है कि कौन अधिकारी को कितना संतुष्ट रख सकता
है। जो नियमों की बात करता है, उसे अव्यावहारिक कहा जाता है और जो हर
बात पर सहमत रहता है, वह ‘टीम प्लेयर’ बन जाता है। इसका सीधा असर काम की
गुणवत्ता पर पड़ता है। योग्य कर्मचारी हतोत्साहित होते हैं और औसत क्षमता वाले लोग
निर्णय की कुर्सियों तक पहुँच जाते हैं।
मीडिया
और चमचागिरी की बढ़ती सांठगांठ
लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व सत्ता
से सवाल करना और जनता को तथ्यपरक जानकारी देना है। लेकिन जब मीडिया का एक हिस्सा
चमचागिरी की राह पकड़ लेता है, तो खबरें सूचना नहीं, प्रशंसा
बन जाती हैं। सवालों की जगह बयान और जांच की जगह प्रचार ले लेता है। इससे न केवल
मीडिया की विश्वसनीयता कमजोर होती है,
बल्कि लोकतांत्रिक संवाद भी प्रभावित
होता है। जनता को सच नहीं, सुविधाजनक सच परोसा जाने लगता है।
सामाजिक
जीवन में फैलता असर
चमचागिरी सत्ता और दफ्तरों तक सीमित
नहीं रही। सामाजिक जीवन में भी यह गहराई से पैठ बना चुकी है। प्रभावशाली लोगों के
आसपास रिश्ते सम्मान पर नहीं, बल्कि लाभ की संभावना पर टिके होते हैं।
इससे समाज में यह संदेश जाता है कि आत्मसम्मान से अधिक उपयोगिता महत्वपूर्ण है।
धीरे‑धीरे ईमानदारी को भोलेपन और स्पष्टता को मूर्खता समझा जाने लगता है।
चमचागिरी
का मनोविज्ञान
चमचागिरी करने वाला व्यक्ति अक्सर
असुरक्षा से ग्रस्त होता है। उसे अपनी योग्यता पर भरोसा नहीं होता, इसलिए
वह सच बोलने का जोखिम नहीं उठाता। चुप रहना या हाँ में हाँ मिलाना उसे सुरक्षित
लगता है। समय के साथ यह आदत उसकी पहचान बन जाती है और आत्मसम्मान हाशिये पर चला
जाता है।
सच
बोलने वालों की घटती जगह
आज सच बोलने वाला व्यक्ति सबसे
असुविधाजनक माना जाने लगा है। उसे नकारात्मक,
अव्यवहारिक या समस्या पैदा करने वाला
कहकर किनारे कर दिया जाता है। लेकिन यही लोग किसी भी व्यवस्था को बेहतर बनाने की
क्षमता रखते हैं। जब ये आवाज़ें दबाई जाती हैं,
तब व्यवस्था भीतर से कमजोर हो जाती है।
सुधार
की दिशा
चमचागिरी का विकल्प केवल ईमानदार संवाद
है। नेतृत्व को आलोचना को शत्रुता नहीं,
सुधार का अवसर समझना होगा। संस्थानों
में ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी,
जहाँ सच बोलने वाले को संरक्षण मिले, न
कि दंड। पारदर्शिता और निष्पक्ष मूल्यांकन ही इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगा सकते हैं।
निष्कर्ष
चमचागिरी का चमचमाता संसार तात्कालिक लाभ भले ही दे दे, लेकिन यह किसी भी समाज या संस्था को दीर्घकालिक मजबूती नहीं देता। सच्ची प्रगति आत्ममंथन, आलोचना और ईमानदार संवाद से ही संभव है। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम तय करें—हमें हर बात पर ताली बजाने वाले चाहिए या सच दिखाने वाले आईने। क्योंकि इतिहास अंततः उन्हीं को याद रखता है, जिन्होंने सच कहने का साहस किया।
(रघुवीर सिंह पंवार )
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