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विश्व हिंदी दिवस : साहित्यिक व्यंग्य

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 हिंदी : भाषणों में अमर, जीवन में गुमशुदा रघुवीर सिंह पंवार  हिंदी बहुत पुरानी भाषा है, इसलिए उसे सब समझ आ जाता है। उसे यह भी पता है कि सम्मान कब सच्चा होता है और कब केवल तिथि देखकर किया जाता है। वह जानती है कि 10 जनवरी आते ही अचानक उसके दिन फिर जाते हैं। मंच सजता है, माइक चमकते हैं और हिंदी को कुर्सी पर बैठा दिया जाता है— ऐसी कुर्सी, जिस पर साल भर बैठने की मनाही रहती है। हिंदी चुपचाप बैठ जाती है। उसे बुलाए जाने की खुशी कम और अगले दिन भूल जाने का डर ज़्यादा होता है। एक दिन की आत्मा हिंदी को अकसर ‘आत्मा’ कहा जाता है। आत्मा होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि उसकी ज़रूरत सबको होती है, लेकिन उसे साथ कोई नहीं रखता। 10 जनवरी को हिंदी आत्मा बनकर मंच पर विराजती है और 11 जनवरी को फिर शरीर से बाहर कर दी जाती है। मंच से कहा जाता है— “हिंदी हमारी पहचान है।” और मंच के नीचे वही पहचान अंग्रेज़ी में हस्ताक्षर करती है। हिंदी देखती है, सुनती है, समझती है— और फिर मुस्कुरा देती है। शिकायत करना उसने बहुत पहले छोड़ दिया है। भाषणों की भारी हिंदी विश्व हिंदी दिवस पर हिंदी को सबसे ज़्यादा नुकसान भाष...

स्वामी विवेकानंद जीवन, विचार और शिक्षा दर्शन

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स्वामी विवेकानंद , भारतीय संत और विचारक    स्वामी विवेकानंद का शिक्षा दर्शन स्वामी विवेकानंद की शिक्षा और बौद्धिक विकास स्वामी विवेकानंद , भारतीय संत और विचारक , का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। उनका असली नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। वे रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे और उन्होंने अपने गुरु के विचारों को पूरे विश्व में फैलाया। विवेकानंद का जीवन और कार्य भारत की आध्यात्मिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनके विचार , भाषण और लेखन ने भारतीय समाज को न केवल आध्यात्मिक रूप से प्रेरित किया बल्कि उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समृद्ध किया ।   प्रारंभिक जीवन और शिक्षा नरेंद्रनाथ दत्त का जन्म एक धनी और संस्कारित परिवार में हुआ। उनके पिता , विश्वनाथ दत्त , एक सफल वकील थे , और उनकी माता , भुवनेश्वरी देवी , धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। नरेंद्रनाथ ने प्रारंभिक शिक्षा ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूशन में प्राप्त की और बाद में प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। वे बचपन से ही अत्यंत मेधावी थे और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में रुचि रखते थे।   रामकृष्ण परमहंस...

चमचागिरी का चमचमाता संसार ( व्यंग्य)

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 सत्ता, व्यवस्था और समाज में फैलती चापलूसी की संस्कृति                              किसी भी समाज , संस्था या लोकतंत्र की वास्तविक सेहत इस बात से पहचानी जाती है कि वहाँ असहमति और सच के लिए कितनी जगह बची है। दुर्भाग्य से हमारे समय की सबसे तेज़ी से फलती‑फूलती प्रवृत्तियों में एक है — चमचागिरी। यह अब केवल व्यक्तिगत व्यवहार या अवसरवादी आदत नहीं रही , बल्कि एक सुव्यवस्थित संस्कृति बन चुकी है , जो सत्ता , प्रशासन , कार्यालयों , मीडिया और सामाजिक जीवन के हर कोने में अपनी चमक बिखेर रही है। बाहर से यह संसार जितना चमकदार दिखता है , भीतर से उतना ही खोखला और भयग्रस्त है। चमचागिरी का मूल सिद्धांत बड़ा सरल है — सच वही है , जो ताकतवर को अच्छा लगे। तथ्य , तर्क और विवेक यहाँ बाधा माने जाते हैं। शब्दों को इस तरह सजाया जाता है कि वे वास्तविकता नहीं , बल्कि इच्छित छवि गढ़ें। यही कारण है कि गलत निर्णय भी दूरदर्शिता कहलाते हैं , विफलताएँ रणनीति बन जाती हैं और चुप्पी को समझदारी का नाम दे दिया जाता है। प्रशंसा और चापलूसी के बीच...

नव वर्ष मंगल हो | नए साल पर आशा, संकल्प और सकारात्मक सोच का संदेश

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 नव वर्ष: आशा, विश्वास और सकारात्मक सोच नव वर्ष मंगल हो नव वर्ष जीवन में नई सुबह की तरह आता है। बीता हुआ साल हमारी स्मृतियों में अनुभव, सीख और कुछ अधूरी इच्छाएँ छोड़ जाता है, और नया साल आशा, उत्साह व संकल्पों का नया द्वार खोल देता है। नव वर्ष केवल कैलेंडर बदलने का अवसर नहीं है, बल्कि अपने भीतर झाँकने, स्वयं को बेहतर बनाने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने का भी समय है। इसलिए हम पूरे मन से कहते हैं— नव वर्ष मंगल हो। नव वर्ष का आगमन हर व्यक्ति के लिए अलग अर्थ रखता है। किसी के लिए यह नई नौकरी की उम्मीद है, किसी के लिए परिवार में सुख-शांति की कामना, तो किसी के लिए अपने सपनों को पूरा करने की नई शुरुआत। बीते वर्ष की सफलताएँ हमें आत्मविश्वास देती हैं और असफलताएँ हमें मजबूत बनाती हैं। नव वर्ष हमें यही सिखाता है कि हार-जीत जीवन का हिस्सा है, लेकिन प्रयास कभी नहीं रुकना चाहिए। आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में हम अक्सर भागते रहते हैं। काम, जिम्मेदारियाँ और प्रतिस्पर्धा के बीच अपने रिश्तों, स्वास्थ्य और आत्मिक शांति को भूल जाते हैं। नव वर्ष हमें रुककर सोचने का मौका देता है—क्या हम स...

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् | Mahishasura Mardini Stotram in Sanskrit & Hindi | देवी दुर्गा की शक्तिशाली प्रार्थना

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  🔹 भूमिका (Introduction) सनातन संस्कृति में देवी शक्ति की उपासना का विशेष महत्व है। जब अधर्म अपने चरम पर पहुँचता है, तब शक्ति स्वयं प्रकट होकर उसका विनाश करती है। महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् इसी दिव्य शक्ति की वंदना है, जिसमें माँ दुर्गा के उस स्वरूप का वर्णन है जिसने महिषासुर जैसे अहंकारी असुर का वध कर देवताओं और मानवता की रक्षा की। यह स्तोत्र न केवल एक धार्मिक रचना है, बल्कि साहस, आत्मबल और धर्म की विजय का प्रतीक भी है। नवरात्रि, दुर्गाष्टमी, शुक्रवार तथा विशेष साधना काल में इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है। 🔹 महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र क्या है? महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् की रचना आदि शंकराचार्य द्वारा की गई मानी जाती है। यह संस्कृत भाषा में रचित एक स्तुति है, जिसमें माँ दुर्गा के पराक्रम, सौंदर्य, करुणा और शक्ति का भावपूर्ण वर्णन मिलता है। यह स्तोत्र इस बात का संदेश देता है कि— अहंकार चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है।   🔹 Mahishasura Mardini Stotram का ऐतिहासिक महत्व पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर नामक असुर को ब्रह...