विश्व हिंदी दिवस : साहित्यिक व्यंग्य

 हिंदी : भाषणों में अमर, जीवन में गुमशुदा

रघुवीर सिंह पंवार 


हिंदी बहुत पुरानी भाषा है, इसलिए उसे सब समझ आ जाता है। उसे यह भी पता है कि सम्मान कब सच्चा होता है और कब केवल तिथि देखकर किया जाता है। वह जानती है कि 10 जनवरी आते ही अचानक उसके दिन फिर जाते हैं। मंच सजता है, माइक चमकते हैं और हिंदी को कुर्सी पर बैठा दिया जाता है— ऐसी कुर्सी, जिस पर साल भर बैठने की मनाही रहती है।

हिंदी चुपचाप बैठ जाती है। उसे बुलाए जाने की खुशी कम और अगले दिन भूल जाने का डर ज़्यादा होता है।


एक दिन की आत्मा

हिंदी को अकसर ‘आत्मा’ कहा जाता है। आत्मा होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि उसकी ज़रूरत सबको होती है, लेकिन उसे साथ कोई नहीं रखता। 10 जनवरी को हिंदी आत्मा बनकर मंच पर विराजती है और 11 जनवरी को फिर शरीर से बाहर कर दी जाती है।

मंच से कहा जाता है— “हिंदी हमारी पहचान है।” और मंच के नीचे वही पहचान अंग्रेज़ी में हस्ताक्षर करती है।

हिंदी देखती है, सुनती है, समझती है— और फिर मुस्कुरा देती है। शिकायत करना उसने बहुत पहले छोड़ दिया है।



भाषणों की भारी हिंदी

विश्व हिंदी दिवस पर हिंदी को सबसे ज़्यादा नुकसान भाषणों से होता है। वहाँ हिंदी इतनी संस्कृतनिष्ठ बना दी जाती है कि वह भाषा नहीं, प्रवेश परीक्षा लगने लगती है। श्रोता शब्द पकड़ने की कोशिश करता है और वक्ता तालियाँ बटोरने में व्यस्त रहता है।

भाषण के अंत तक हिंदी इतनी थक जाती है कि वह खुद ही आम आदमी से दूर भागना चाहती है। फिर अगले साल वही प्रश्न उठता है— नई पीढ़ी हिंदी से दूर क्यों है?

क्योंकि आपने हिंदी को बोलने की नहीं, सहने की भाषा बना दिया है।


दफ्तर की दोहरी नीति

दफ्तरों में हिंदी का अपना एक अलग विभाग है— सजावट विभाग। वहाँ हिंदी पोस्टर बनती है, स्लोगन बनती है और बोर्ड पर टँगती है। असली काम जिस विभाग में होता है, वहाँ अंग्रेज़ी का एकाधिकार है।

निर्णय अंग्रेज़ी में होते हैं, आदेश अंग्रेज़ी में निकलते हैं और हिंदी से अपेक्षा की जाती है कि वह अंत में आकर फोटो खिंचवा ले।

हिंदी को अब इस व्यवस्था की आदत हो गई है। उसे पता है— यहाँ भाषा नहीं, सुविधा चुनी जाती है।

नई पीढ़ी का अपराध

फिर आरोप लगाया जाता है— आज की पीढ़ी हिंदी नहीं जानती।

हिंदी मुस्कुराती है। उसे मालूम है कि यह अपराध नई पीढ़ी ने नहीं, पिछली पीढ़ी ने किया है। जब घर में कहा गया— अंग्रेज़ी बोलो, आगे बढ़ोगे, तब हिंदी अपने आप पीछे हो गई।

बच्चा वही भाषा सीखता है, जिसमें सपने दिखाए जाते हैं। हिंदी में उसे केवल संस्कार दिखाए गए, अवसर नहीं।


सोशल मीडिया की दिखावटी हिंदी

सोशल मीडिया पर हिंदी खूब दिखाई देती है। पोस्टर हिंदी में, भावना इमोजी में और टिप्पणियाँ अंग्रेज़ी में।

“Happy Hindi Day” लिखकर हिंदी को बधाई दी जाती है। हिंदी सोचती है— काश मुझे ‘हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ’ कहने की हिम्मत भी किसी में होती।

यह हिंदी का डिजिटल युग है— जहाँ भाषा ट्रेंड में रहती है, जीवन में नहीं।


हिंदी को लेकर डर

सच यह है कि हिंदी को मरने का डर नहीं है। उसे डर है इस्तेमाल न होने का। भाषा किताबों से नहीं, लोगों से ज़िंदा रहती है।

जिस दिन हिंदी केवल भाषणों और पाठ्यक्रमों में रह जाएगी, उस दिन वह सच में अकेली हो जाएगी।



समाधान की सादगी

हिंदी को बचाने के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन नहीं चाहिए। उसे बस इतना चाहिए—

  • घर में उससे बात की जाए

  • दफ्तर में उससे काम लिया जाए

  • बच्चों को उससे डराया न जाए

हिंदी बोझ नहीं है। उसे बोझ बनाया गया है।


उपसंहार

हिंदी अब इंतज़ार में है। उसे पता है— जब भाषण थक जाएँगे, जब अंग्रेज़ी भी बोझ लगने लगेगी, तब लोग फिर उसकी ओर लौटेंगे।

उस दिन शायद कोई विश्व हिंदी दिवस नहीं होगा।

उस दिन हिंदी होगी— रोज़मर्रा की ज़िंदगी में, बिना माइक के, बिना तालियों के।

और शायद वही हिंदी का असली उत्सव होगा।


प्रश्न–उत्तर (FAQ)

प्रश्न 1: विश्व हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है?

उत्तर:
विश्व हिंदी दिवस हिंदी भाषा के अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार के लिए मनाया जाता है, ताकि हिंदी को वैश्विक मंच पर पहचान और सम्मान मिल सके।


प्रश्न 2: क्या हिंदी दिवस मनाने से हिंदी मजबूत हो जाती है?

उत्तर:
हिंदी दिवस मनाने से हिंदी पर भाषण ज़रूर बढ़ जाते हैं, लेकिन हिंदी तभी मजबूत होगी जब उसे रोज़मर्रा के जीवन में अपनाया जाएगा।


प्रश्न 3: हिंदी पर व्यंग्य लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ती है?

उत्तर:
क्योंकि जब उपदेश काम न करें, तब व्यंग्य सच को आईना दिखाता है। व्यंग्य भाषा के प्रति हमारे दोहरे व्यवहार को उजागर करता है।


प्रश्न 4: आज की पीढ़ी हिंदी से दूर क्यों होती जा रही है?

उत्तर:
क्योंकि हमने हिंदी को भावना से जोड़ा और अंग्रेज़ी को भविष्य से। अवसरों की भाषा बदलते ही पीढ़ी की भाषा भी बदल गई।


प्रश्न 5: क्या अंग्रेज़ी हिंदी के लिए खतरा है?

उत्तर:
नहीं, अंग्रेज़ी नहीं— हमारी सुविधा और मानसिकता हिंदी के लिए सबसे बड़ा खतरा है। भाषा से ज़्यादा सोच बदलने की ज़रूरत है।


प्रश्न 6: हिंदी को बचाने का सबसे सरल उपाय क्या है?

उत्तर:
हिंदी को मंच से उतारकर जीवन में उतारना। घर, दफ्तर और सोच—तीनों जगह हिंदी को सहज रूप से अपनाना।


प्रश्न 7: विश्व हिंदी दिवस पर लिखा गया व्यंग्य क्या संदेश देता है?

उत्तर:
यह संदेश देता है कि हिंदी को साल में एक दिन नहीं, हर दिन सम्मान और उपयोग दोनों की ज़रूरत है।


प्रश्न 8: क्या व्यंग्य हिंदी के प्रति नकारात्मक दृष्टि है?

उत्तर:
नहीं, व्यंग्य असंतोष नहीं, चिंता की अभिव्यक्ति है। यह भाषा के प्रति प्रेम का सबसे ईमानदार रूप है।

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