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औक़ात का आईना गरीब , समझकर किया गया अपमान

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  गरीब समझकर अपमान ,  प्रेरक लघुकथा लग्जरी शोरूम में सादा कुर्ता पहने एक आदमी सुबह के दस बजे थे   । शोरूम की कांच की दीवारें चमक रही थीं , AC   की ठंडी हवा और महंगी कारों की कतारें अमीरी का प्रदर्शन कर रही थीं   । इसी माहौल में एक आदमी अंदर जाता  हुआ — सादा कुर्ता ,  पुरानी चप्पल गले में गमछा  और चेहरे पर गहरी शांति। उसका नाम था   मोहन   । रिसेप्शन पर बैठी युवती ने ऊपर से नीचे तक देखा। नजर कुछ पल रुकी ,  फिर जैसे फिसल गई। यह नज़र सम्मान की नहीं ,  तौलने की थी।   पूर्व पत्नी और अपमान का पहला वार अभी केबिन से तेज कदमों की आवाज़ आई। ब्रांडेड कपड़े ,  ऊँची एड़ी ,  आत्मविश्वास से भरी चाल — नंदिनी ,  शोरूम की मैनेजर। नजर मोहन  पर पड़ी। चेहरा सख्त हो गया। “ तुम ?” फिर व्यंग्य — “ यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है । यह लग्जरी कार का  शोरूम है ,  कोई सस्ता बाज़ार नहीं। ” कुछ ग्राहक रुक गए। किसी के चेहरे पर मुस्कान थी ,  किसी की आंखों में तिरस्कार।   गरीबी ,...

अटल बिहारी वाजपेयी जयंती: राजनीति का संत, शब्दों का शिल्पी और राष्ट्र का अटल व्यक्तित्व

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 भारत की राजनीति के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो सत्ता से बड़े और समय से भी आगे दिखाई देते हैं। ऐसे ही युगपुरुष थे भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी । उनकी जयंती केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि लोकतंत्र, मर्यादा, संवाद और राष्ट्रप्रेम के मूल्यों को फिर से जीवित करने का दिन है। अटल जी का नाम आते ही मन में एक ऐसे नेता की छवि उभरती है, जो कठोर निर्णय ले सकता था, लेकिन उसका हृदय अत्यंत कोमल था। जो विरोधियों का भी सम्मान करता था और शब्दों से पुल बनाता था, दीवारें नहीं। अटल बिहारी वाजपेयी: प्रारंभिक जीवन और संस्कार अटल बिहारी वाजपेयी जीवन परिचय अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ। उनके पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी एक शिक्षक और कवि प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। परिवार का वातावरण साहित्य, अनुशासन और राष्ट्रचिंतन से भरा हुआ था। बाल्यकाल से ही अटल जी में अध्ययन, लेखन और चिंतन की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी। वे केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रहे, बल्कि समाज और देश को समझने की जिज्ञासा उनमें प्रारंभ से ही थी। ...

किसान कहे जाएं या अन्नदाता? मेहनत किसान की, मुनाफा दूसरों का

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 किसान दिवस अन्नदाता किसान, MSP समर्थन मूल्य, किसान कर्ज, किसान आत्महत्या, कृषि संकट, किसान आंदोलन, भारतीय किसान (रघुवीर सिंह पंवार ) किसान कहें या अन्नदाता—भारत की आत्मा खेती में बसती है। भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां लगभग एक तिहाई आबादी खेती-किसानी से जुड़ी है। देशवासियों के पेट की भूख की ज्वाला शांत करने वाला वही किसान है, जिसकी मेहनत पर पूरा समाज जीवित है। दुनिया अन्न ग्रहण करके जीती है और उस अन्न का हर दाना किसान की पसीने की कीमत पर पैदा होता है। कड़कड़ाती ठंड, झुलसाती धूप और मूसलाधार बारिश—हर मौसम में किसान खेतों में डटा रहता है। दिन-रात मेहनत करके वह फसल उगाता है, तभी कहीं जाकर लोगों की थाली भरती है। लेकिन विडंबना यह है कि किसान को उसकी मेहनत का फल उसके श्रम के अनुसार नहीं मिल पाता। कभी कम वर्षा, कभी अतिवृष्टि, कभी ओलावृष्टि—प्रकृति की मार किसान की फसल को पल भर में तबाह कर देती है। ऐसे में किसान न अपने परिवार का सही ढंग से पालन कर पाता है, न बच्चों की उच्च शिक्षा, न बेटा-बेटियों की शादी और न ही अपने सपनों का घर बना पाता है। देश के किसान की हालत दिन-ब-दिन दयनीय होती जा ...

हनुमान चालीसा अर्थ सहित (लाइन बाय लाइन) | सरल हिंदी में सम्पूर्ण व्याख्या

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हनुमान चालीसा हिन्दू धर्म का एक अत्यंत श्रद्धेय और प्रभावशाली स्तोत्र है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित यह चालीसा केवल पाठ का विषय नहीं, बल्कि भक्ति, साहस, सेवा और आत्मबल का जीवन-दर्शन है। इस विशेष लेख में हम हनुमान चालीसा का मूल पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति सरल हिंदी अर्थ सहित प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि श्रद्धालु और पाठक इसका भाव सही रूप में समझ सकें। बजरंगबली की पूजा और आरती का धार्मिक दृश्य हनुमान चालीसा : दोहा (अर्थ सहित) श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। → गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को शुद्ध करता हूँ। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥ → मैं श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करता है। बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। → स्वयं को अल्पबुद्धि जानकर पवनपुत्र हनुमान का स्मरण करता हूँ। बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस विकार॥ → हे हनुमान! मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए, मेरे सभी कष्ट दूर कीजिए। चौपाई : पंक्ति-दर-पंक्ति सरल अर्थ जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। → हनुमान जी ज्ञान और सद्गुणों के सागर हैं। जय कपीस तिहुँ...

लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल: जन्म, शिक्षा और भारत की एकता के महान शिल्पकार

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 सरदार वल्लभभाई पटेल जन्म, सरदार पटेल शिक्षा, लौह पुरुष, सरदार पटेल पुण्यतिथि, भारत की एकता, रियासतों का विलय, भारतीय इतिहास भारत के इतिहास में सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम दृढ़ इच्छाशक्ति, अनुशासन और राष्ट्रनिष्ठा का प्रतीक है। उनकी पुण्यतिथि पर देश उस महापुरुष को स्मरण करता है, जिसने स्वतंत्र भारत को केवल आज़ादी ही नहीं, बल्कि एकता और स्थायित्व भी दिया। जन्म: साधारण परिवार से असाधारण व्यक्तित्व तक सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद नगर में हुआ था। उनका परिवार एक साधारण कृषक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ था। बचपन से ही उनके स्वभाव में आत्मसंयम, साहस और नेतृत्व के गुण दिखाई देने लगे थे। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी, यही गुण आगे चलकर उन्हें राष्ट्रनिर्माता बनाते हैं। शिक्षा: संघर्ष से सफलता तक का सफर सरदार पटेल की प्रारंभिक शिक्षा गुजरात में ही हुई। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने शिक्षा को कभी बाधित नहीं होने दिया। युवावस्था में उन्होंने वकालत की पढ़ाई की और कानून के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। उच्च शिक्षा के लिए वे इंग्ल...

भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर एक भावनात्मक श्रद्धांजलि

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 6 दिसंबर… यह तारीख भारत के इतिहास में एक ऐसा दिन है, जब करोड़ों लोग बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को याद करते हैं। यह दिन हमें सिर्फ एक महापुरुष के निधन की याद नहीं दिलाता, बल्कि यह सोचने का अवसर भी देता है कि हम आज जिस भारत में जी रहे हैं, उसकी नींव किन आदर्शों पर रखी गई। डॉ. अंबेडकर ने अपने पूरे जीवन में एक ही सपना देखा— एक ऐसा भारत, जहाँ सभी को बराबरी का अधिकार मिले, जहाँ किसी का सम्मान उसकी जाति से नहीं बल्कि उसकी योग्यताओं से तय हो। बाबा साहेब: संघर्ष से रोशन हुआ जीवन उनका जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था। भेदभाव, गरीबी, अपमान… इन सबने उन्हें तोड़ने की कोशिश की, लेकिन बाबा साहेब टूटे नहीं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि— “कठिन परिस्थितियाँ महान व्यक्तित्वों को नहीं रोकतीं, बल्कि उन्हें और मजबूत बनाती हैं।” उनकी शिक्षा के प्रति दृढ़ इच्छा, उनकी मेहनत और उनका संघर्ष आज भी हर युवा के लिए प्रेरणा है। संविधान: एक समतामूलक भारत का सपना भारत का संविधान सिर्फ क़ानूनों की किताब नहीं है; यह बाबा साहेब का वह सपना है जिसमें वे चाहते थे कि हर व्यक्ति— सम्मान से जिए, न्याय पाए...

टंट्या भील: जंगलों का लाल, न्याय का सिपाही

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 टंट्या भील: आदिवासी अस्मिता के प्रतीक, अंग्रेजों के ख़िलाफ़ गोरिल्ला युद्ध के महानायक टंट्या भील , टंट्या मामा , अमर शहीद टंट्या भील , टंट्या भील का इतिहास , टंट्या भील कौन थे , भील समुदाय का नायक , आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी , मध्यप्रदेश का जननायक , टंट्या भील की जीवनी , गोरिल्ला युद्ध नेता , टंट्या भील की कहानी , भारतीय आदिवासी वीर आदिवासी अधिकार, आदिवासी विद्रोह, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, ब्रिटिश शासन का प्रतिरोध, भील समाज का संघर्ष, मध्यभारत का इतिहास, जबलपुर फाँसी, जननायक टंट्या, टंट्या मेला, टंट्या भील स्मारक। भूमिका: इतिहास की परछाइयों से उठता एक तेजस्वी नाम भारत की स्वतंत्रता संग्राम की कथा में कुछ नाम उतने ही तेजस्वी हैं जितने चर्चा से दूर। ऐसे ही एक महानायक हैं— अमर शहीद टंट्या भील , जिन्हें मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान की जनता ‘ टंट्या मामा ’ कहकर सम्मानित करती है। आजादी के संघर्ष को अक्सर केवल शहरों और राजनीतिक मंचों तक सीमित मान लिया जाता है, लेकिन जंगलों, पहाड़ों और आदिवासी समाज में भी अंग्रेजों के विरुद्ध एक जबरदस्त क्रांति चल रही थी। इस क्रांति का सबस...